महाकाव्य
( दो पथिक, एक ब्रजधाम )
श्री राधा विजयते, लिखूँ प्रथम प्रणाम,
श्याम के चरणों में अर्पित, मेरा हर एक काम।
दो पथिक चले थे, लेकर एक ही नाम,
राहें अलग थीं, पर एक ही था धाम।ब्रज की गली-गली में, प्रेम का सिंगार है,
हर कण में बसा हुआ, राधा का प्यार है।
मोर पंख मुकुट सजे, होंठों पर बांसुरी,
यमुना की लहर-लहर, गाती यही धुन पूरी।निधिवन का रहस्य देखा, जहाँ श्याम रचें रास,
तुलसी की छाया तले, प्रेम का मधुर विलास।
टटिया स्थान की शांति में, मन को मिला आराम,
जहाँ संतों की चरण-रज, कर दे भव से पार।बेलवन की वो अधूरी रात, अधूरी ना रही,
श्याम की याद में, हर रात पूरी हो गई।
कदम-कदम पर कान्हा, कदम-कदम पर श्यामा,
हर डाली पर लिखा है, राधे-कृष्ण का नामा।फिर आया वो दिन, हिम्मत का आह्वान,
पच्चीस कोस की परिक्रमा, गोवर्धन महान।
पैरों में छाले पड़े, पर मन में था जोश,
राधे-राधे बोल के, किया हर कष्ट को खामोश।रात अंधेरी, पथ पथरीला, नहीं कोई डर,
साथ में श्याम चलें, तो कैसा डगर-डगर।
हम दो पथिकों ने, हिम्मत ना हारी,
गोवर्धन की परिक्रमा, प्रेम से पूरी सारी।रात्रि में वृंदावन घूमा, दीपक की लौ संग,
हर मंदिर की घंटी बोली, राधे-राधे के संग।
थके नहीं चरण हमारे, थका नहीं ये मन,
क्योंकि हर मोड़ पर खड़े थे, मेरे बाँके बिहारी सजन।पर समय का चक्र चला, आई ऐसी शाम,
छोड़ना पड़ा ब्रज को, छोड़ना पड़ा धाम।
दो दिन का रास्ता था, दो युग जैसा लगा,
पीछे मुड़ के देखा तो, सब कुछ वहीं ठहर गया।शरीर तो घर आ गया, प्राण वहीं रह गए,
आँखें नम हैं आज भी, जो वृंदावन में बह गए।
दो बार सजी, दो बार चली, फिर भी ना जा सकी,
राधा रानी की मर्जी थी, शायद मैं ना समझ सकी।लोग कहते हैं घर आ गई, मैं कहती हूँ कहाँ आई,
मेरा घर तो वहीं है, जहाँ मेरी शाम बिहारी है।
हज़ारों कोस की दूरी, पर दिल को गवारा नहीं,
वृंदावन के बिना तो, एक पल गुज़ारा नहीं।पहले सोचती थी, नाम तो बेकार सा काम है,
माला पकड़ना, जप करना, समय का विराम है।
पर जब टूटी, जब रूठा, सारा संसार,
तब एक शब्द ने दिया, मुझे नया आधार।राधा! बस एक शब्द, और साँस चल पड़ी,
डूबती हुई नैया मेरी, किनारे लग पड़ी।
राधा-राधा जपती हूँ, उठते-बैठते, सोते-जागते,
आँसू भी अब मोती बनें, राधा-राधा कहते।यह नाम नहीं डोर है, जो ब्रज तक जाती है,
शरीर ना जा सके तो क्या, आत्मा पहुँच जाती है।
जप से मन टिकने लगा, भटकना छूट गया,
राधा नाम के रंग में, सारा जग ही लूट गया।हे लाडली जी, सुन लो, तुम्हारी बेटी पुकारे,
तेरी गोद के बिना, हर साँस बिखरती जाए।
क्षमा करो जो भूल हुई, मैं नादान, अनजान,
तुम तो करुणा की मूर्ति, तुम तो हो दया की खान।माता-पिता का प्यार मिला, बहनों का सहारा,
पर जो सुख ब्रज में मिला, नहीं मिलता दोबारा।
गुरु ने दी दिशा मुझे, कक्षा ग्यारह से तब,
छह पुस्तकें लिखीं, यह सातवीं है अब।पर यह पुस्तक पुस्तक नहीं, यह तो मेरा हृदय है,
हर पृष्ठ पर लिखा हुआ, मेरा ही उदय है।
जिसने भी इसे पढ़ा, वो ब्रज से जुड़ जाएगा,
राधा नाम की धारा में, खुद ही बह जाएगा।अब ना चाहिए महल, ना चाहिए मान,
बस दे दो ब्रज की धूल, वही है मेरा सम्मान।
जब प्राण निकलें मेरे, यमुना किनारा हो,
सामने बाँके बिहारी, और राधा प्यारा हो।दो पथिक चले थे, एक धाम की ओर,
राहें चाहे अलग रहीं, पर प्रेम था पुरजोर।
आज भी वही आस है, वही है इंतज़ार,
फिर लौटेंगे दोनों, उसी ब्रज के द्वार।राधा राधा राधा, यही जप है हमारा,
श्री राधे श्री राधे, यही धन है हमारा।
जब तक साँस रहेगी, नाम ना छूटेगा,
ब्रज से नाता हमारा, कभी ना टूटेगा।