अपने
जिन्हें अपना समझा,
वही फ़ासले बन गए,
जिन्हें दिल में रखा,
वही दर्द बन गए।
अपनों की महफ़िल में
तन्हा रह गई,
हँसी होंठों पर थी,
रूह रोती रही।
जिनसे सुकून माँगा,
वही बेचैनी दे गए,
जिनसे दिल जोड़ा,
वही उसे तोड़ गए।
अब सीने में
एक ख़ामोश-सा शोर है,
हर अपना पास होकर भी
कितना दूर है।
चेहरे पर
रौशनी रखी है,
दिल में
रात बची है।
दुनिया के लिए
सब कुछ हसीन है,
और मेरी ख़ामोशी में
पूरा ग़म दफ़्न है।
अपने ही जब
हमसफ़र न रहे,
तो फिर किसे कहें
कि हम अकेले नहीं?
अब बस—
एक मुस्कान है,
एक साया है,
और दिल में
कुछ बुझी हुई
आग है।