चिंगारी

दिल में शोला,

लबों पे नूर रखती हूँ,

मैं अपनी राख में भी

थोड़ी-सी धूप रखती हूँ।

पलकों पे ठहरी

बारिशों का शहर है,

होंठों पे फिर भी

मुस्कुराहट का असर है।

रातों ने

कितने राज़ रखे हैं सीने में,

सुबह फिर सजती है

उन्हीं ख़ामोश ज़ख़्मों से।

कुछ ख़्वाब

राख हुए,

कुछ ख़्वाहिशें

धुआँ हुईं—

फिर भी

हथेली पर

एक नन्ही-सी लौ रखी है।

हवा चाहे

जितनी भी तेज़ हो,

ये चिंगारी

बुझती नहीं।

आँधियों के शहर में

एक दिया-सा जलती हूँ,

बिखरती हूँ ख़ामोशी में,

और सुबह

फिर संवरती हूँ।

मेरी ख़ामोशी में

कितनी सदाएँ हैं,

मेरी हँसी में

कितनी दुआएँ हैं—

किसे ख़बर।

रात

मुझसे मेरा सब्र माँगती है,

सुबह

मेरे चेहरे से उजाला।

मैं दोनों के बीच

एक ख़्वाब की तरह

चलती रहती हूँ।

दिल में आग,

आँखों में धुआँ,

होंठों पे चाँदनी—

और क़दमों में

रास्ता लिए चलती हूँ।

न कोई शिकवा,

न कोई गिला,

बस वक़्त की हथेली पर

अपना वजूद रखती हूँ।

जो बुझा नहीं,

वो उम्मीद है मेरी।

जो दिखा नहीं,

वो दर्द है मेरा।

और जो हर सुबह

चेहरे पर खिल उठता है—

वो मेरी

छोटी-सी ख़ूबसूरत चिंगारी है।

दिल में आग लिए,

राख को गुलाब किए,

हर रात को

सहर किए—

मैं चलती हूँ।

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