मेरे सिवा
शहर भर में
रौशनियाँ बहुत थीं,
मगर मेरे हिस्से
कोई दिया न था।
भीड़ में
चेहरे तो हज़ार मिले,
मगर कोई चेहरा
मेरा अपना न था।
हर मोड़ पर
अपने ही साए मिले,
हर राह पर
अजनबी-से क़दम।
मैंने हाथ बढ़ाया—
हवा ने थाम लिया,
मैंने दिल खोला—
ख़ामोशी ने सुन लिया।
किससे कहती
किस दर्द की कहानी,
किसे दिखाती
आँखों में ठहरा पानी?
कुछ रिश्ते
नाम के अपने थे,
कुछ अपने
वक़्त के साथ पराए।
मेरी ख़ामोशी
किसी ने पढ़ी नहीं,
मेरी आँखों की
ज़ुबाँ किसी ने सुनी नहीं।
और मैं—
एक किनारे पर
खड़ी रही,
जहाँ से
पूरा जहाँ दिखाई देता था,
मगर मेरी तरफ़
कोई रास्ता नहीं आता था।
जब दुनिया ने
अपने दरवाज़े बंद किए,
मैंने रात से
दो बातें कर लीं।
जब कोई
साथ चलने वाला न मिला,
मैंने अपने साए को
हमसफ़र कर लिया।
अब शिकायत भी
किससे करूँ—
हवा अपनी,
रास्ते अपने,
आँसू अपने,
और सफ़र भी अपना।
कभी लगता है
ये पूरा जहाँ
मेरे ख़िलाफ़ खड़ा है,
रात गहरी है,
राह तन्हा है,
दूर तक
कोई हमसफ़र नहीं।
फिर भी
एक साया
साथ चलता है,
जो धूप में
मुझसे पहले चलता,
और अँधेरे में
मुझमें ही मिल जाता है।
कभी चाँद
मेरी छत पर उतरता है,
कभी सितारे
ख़ामोशी में बिखर जाते हैं,
मगर कोई
मेरी रात का
राज़दार नहीं।
शायद इस सफ़र में
मेरे हिस्से
बस मैं ही हूँ—
एक धड़कता हुआ दिल,
एक थका हुआ साया,
कुछ अधूरे ख़्वाब,
और आँखों में
ठहरी हुई रौशनी।
दुनिया चाहे
जितनी दूर हो जाए,
रास्ते चाहे
जितने वीरान हों—
एक लौ
अब भी जलती है,
एक क़दम
अब भी उठता है,
और एक मुसाफ़िर
अब भी चलता है—
मेरे सिवा।