रूप
के तुम प्रारूप उस रूप के, जिस रूप में कई रूप हैं…
एक रूप कोई रौद्र सा,
एक रूप कोई फूल सा…
तुम भयभीत न हो उस रूप से,
जिस रूप में हो तुम बसे…
हो तुम बसे जिस रूप में,
वो रूप क्या कोई और है?
जिस रूप की मैं कर रहा हूँ व्याख्या,
वो रूप भी इस ओर…
वो रूप भी इस ओर है।
सूरज की तपती धूप है,
वो धूप में हो तुम बसे।
वो धूप न कोई और है,
वो रूप न कोई और है,
जिस रूप में हो तुम बसे।