कुछ ढूँढ रहा है क्या ?
कुछ ढूँढ रहा है क्या?
क्या खो गया है तेरा,
रात को सोया था न तू,
मुंह धोकर देख, क्या पता
हो गया हो सवेरा!
किसी की तलाश में है तू,
या किसी के इंतजार में है?
खुद पर भरोसा कर ले,
सब जा चुके हैं,
और तेरी नाव अभी भी मझधार में है।
अभी भी खड़ा है, कुछ सवाल हैं क्या तेरे?
तुझे इल्म नहीं इतना कि शिकायत करना मना है यहाँ।
या तो अपना ले या फिर बता दे,
कि आसमाँ को छूने के ख्वाब हैं क्या तेरे?
तेरी सुनने वाला कोई नहीं है,
सच कहूँ तो कभी था भी नहीं,
खामोशी चुभती ज़रूर है मगर
उतनी भी बुरी नहीं होती,
अंत के बिना कहानियाँ पूरी नहीं होती,
और तेरी कहानी लिखने वाला कोई और कभी था ही नहीं।
मान क्यों नहीं लेता कि कुछ तेरे वश में नहीं,
स्पष्टता की ज़रूरत होती है आगे बढ़ने के लिए, कश्मकश की नहीं।
मत रख मन में मलाल कुछ भी,
रख ले समेट कर उन आँसुओं को अपने,
बस चलता चल सफर पर,
मत कर किसी से सवाल कुछ भी।
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