मन का शोर — The noise within

ख़ुद को लिखूँ, ख़ुद को मिटाऊँ, या ख़ुद को बिखेरूँ, ख़ुद को सजाऊँ?

मन में ख़याल इतने सारे हैं, समझ नहीं आता, किसे पहले सुलझाऊँ। डूबी हूँ इस तरह से अपनी उलझनों में, कि ख़ुद को ढूँढूँ या ख़ुद में ही खो जाऊँ?

कभी लगता है, ख़ामोशी को लफ़्ज़ बना दूँ, कभी सोचूँ, हर लफ़्ज़ को ख़ामोश कर जाऊँ। जो शोर मचा है इस दिल के भीतर, उसे काग़ज़ पर उतारूँ या सीने में ही दबाऊँ?

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Kritika Anand
Bihar