ज़मीर से गिरकर

शर्म तो आती नहीं,

बग़ैर किसी ज़मीर के बढ़ते जाओ,

इतनी पस्ती में गिर जाओ,

कि हर नेकी और सही इंसान भी

तुम्हारे झूठ के सामने छोटा लगे।

न किसी की परवाह करो,

बस ख़ुदगर्ज़ी पहले हो,

बाक़ी किसी का ग़रज़ नहीं।

ये ज़िंदगी तो महदूद है,

ऐसे रौंदते जाओ,

जैसे बाक़ी कोई बशर नहीं।

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LIYAKHAT ALI KHAN