फिर भी एक यक़ीन सा है

फिर दौर आया है हमें बाँटने का,

फिर बहेगा ख़ून मासूमों का।

जिसने ये ज़ख़्म सहे थे, फिर फिसलने लगे हैं  ,

फिर कोई हमें हमारी पहचान अलग करके,

ग़ुलाम बना रहा है, तानाशाह बनके।

क्या इतना आसान है

कि वही पुरानी चाल दोहराए,

और हम लड़ जाएँ?

बस इतना भाईचारा था

कि सौतेले बन के फिर बँट जाएँ?

रुको… ये कौन हैं?

ये लोग तो हमारा कल हैं।

बस उठा ली मशाल

और कूद पड़े मैदान में।

न इन्हें अलग ज़ात दिखी,

न कोई नस्ल ऊँच-नीच में बँटी।

बस जुट गए हैं एक मक़सद के लिए।

अब मुझे यक़ीन हुआ,

जब-जब कोई साज़िश आई,

मेरे वतन के लोगों की

दबी समझदारी फिर उभर आई।

ये बस ज़मीन ही तो है,

हम सब रहते बशर ही तो हैं।

फिर भी इसके लिए एक जुनून-सा है,

दिल में एक सुकून-सा है।

रहते जिस मुल्क में हम,

इसमें सब मामून-सा है।

#IndependenceWritingContest2026 

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LIYAKHAT ALI KHAN