मेरा वजूद
मेरा वजूद
“तन्हाई मेरी चीख रही,
ना अपनों ने सुना, ना ग़ैरों ने।
क्या लफ़्ज़ ज़रूरी थे मेरे वजूद के होने के?”
“रुख़्सती तो हुई तेरी महफ़िल से जल्दबाज़ी में,
कुछ कहना अभी बाकी था, कुछ सुनना अभी बाकी था।
कीमत अगर मेरे वजूद की मुझे मिल जाती,
तो रुकना मेरा लाज़िमी था।”
“नेकी का सवाब नहीं चाहा मैंने,
फिर भी बेवफ़ाई मिली मुझको,
क्या दिल खोल के रख देना भी
अब गुनाह हो गया?”
“अर्श क्या, फ़र्श क्या, जब दुनिया ही मेरी लूट गई,
ना ऐतबार रहा मुझे इस दुनिया का,
रुख़्सत करो अब मुझे भी —
अब जन्नत क्या, और जहन्नुम क्या।”