शोहरत की फ़िक्र

हम किसी को याद न आएँ, यही अच्छा है,

हमारे जाने के बाद वैसे भी किसी का क्या जाता है।

न हमें शोहरत की फ़िक्र है, न नाम का गुमाँ,

क्योंकि जितना कर गए, बस उतना हिसाब बनता है।

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LIYAKHAT ALI KHAN