शोहरत की फ़िक्र
हम किसी को याद न आएँ, यही अच्छा है,
हमारे जाने के बाद वैसे भी किसी का क्या जाता है।
न हमें शोहरत की फ़िक्र है, न नाम का गुमाँ,
क्योंकि जितना कर गए, बस उतना हिसाब बनता है।
हम किसी को याद न आएँ, यही अच्छा है,
हमारे जाने के बाद वैसे भी किसी का क्या जाता है।
न हमें शोहरत की फ़िक्र है, न नाम का गुमाँ,
क्योंकि जितना कर गए, बस उतना हिसाब बनता है।