मेघों में सूर्य: भारत की समभाव संस्कृति
आज भारत में पेपर लीक विवादों, वैश्विक सूचकांकों में निम्न स्थान, पहलगाम हमले, कोलकाता रेप केस आदि घटनाओं के कारण घोर निराशा छाई हुई है, किंतु झंझावातों के दौर में प्रायः हम अंधकारमयी मेघों की परिधि पर चमकती रजत रेखाएं नहीं देख पाते; जो द्योतक हैं उस मूल ऊर्जा स्रोत, असीम तेज-पुंज का, जिसने अगणित बार मेघों को छिन्न-भिन्न कर दिया।
लक्ष्मी अग्रवाल के साथ आलोक दीक्षित को भी ‘स्टॉप एसिड अटैक्स’ अभियान में जीवन झोंकते देख मुझे उस मूल ऊर्जा स्रोत का अनुभव हुआ, जिसने ‘त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह’ के लेखक को लिखने पर विवश किया होगा—
”प्रत्येक पुरुष में एक स्त्री और प्रत्येक स्त्री में एक पुरुष उसी भांति अव्यक्त रूप से विद्यमान रहते हैं जैसे कोयले की कालिमा में हीरा की छटा, कठोर पर्वतों के हृदय में कोमल सरिता, जल में प्रचंड अग्नि, पापी में पवित्र परमात्मा, नृत्य में एक शांत लय, शांति में शिव का नृत्य और शून्य में अनंत ब्रह्माण्ड।”
इसी समभाव की परंपरा के कारण सयाउद्दीन पासा ने पक्षियों, डॉ. प्रकाश व मंदाकिनी आम्टे ने वन्यजीवों और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने देश-रक्षा में स्वयं को अर्पित किया। जब जीवन-मृत्यु में अभेद हो जाता है और पराया दर्द अपना लगता है, तब इसी अदम्य साहस का जन्म होता है—जो चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग में भी दिखा।
समभाव की यह अमर ज्योति मेरे सपनों के भारत को जन्म देगी। शोर और अंधा करने वाली चकाचौंध नहीं होगी, कुछ भी अत्यधिक नहीं होगा; किंतु लाचारी भी नहीं होगी, प्रीति, कला, संगीत, उत्साह, संतोष, शांति और परमानंद होगा।
#IndependenceWritingContest2026
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