आधार और शिखर
एक रोज गर्वित इमारत ने मुझसे कहा तनकर,
मेरे पैरों तले पड़ी रहना सदा दासी बनकर।
मैं भूधर के शिखर से सदा संवाद करती हूँ,
अपने मस्तक पर किरीट सम सूरज-चाँद धरती हूँ।
मेघ-खग की पंक्तियाँ भी मुझे देख कर हैं लजाती,
मैं खड़ी हो मध्य में पूरे नगर को देख पाती।
मैंने मन ही मन में सोचा— मैं ही तो तुम्हारा आधार हूँ,
मुझ पर ही तो तुम टिकी हो, मैं तुम्हारी नींव हूँ संसार हूँ।
मैं ही आग में पककर तुम्हारी काया बनाती,
तुम मेरी संतान हो, तुम पर सदा प्रेम की छाया बरसाती।
वो सविता भी अपनी किरणों से मेरे शरीर को ही निशदिन सजाती,
चाँदनी भी अपनी शीतल सुधा मुझ पर ही लुटाती।
तुम तो मेरी आत्मजा— ये जानते हैं रवि-शशि,
इसीलिए तुम्हारे शीश पर विराजती है उनकी हँसी।
भूधर को भी मैं धारण करती इसीलिए धरा कहलाती,
बदलियाँ भी मेरे चरण धोने को सदा नीर बहाती।
पक्षियों को गगन में कहाँ आराम मिलता,
मेरी शरण में आकर ही उन्हें अंततः विश्राम मिलता।
उन्नति, तकनीकी शक्ति और स्वतंत्रता के शिखर आकाश में अचानक नहीं उठते; वे धर्म और संस्कृति की धरती से जन्म लेते हैं, और उसी आधार के दृढ़ रहने पर ही अटल बने रहते हैं। मुझे भारतीय संस्कृति की दृढ़ता में अटूट आस्था है।
#IndependenceWritingContest2026