रॉन्ग नम्बर

​सुबह की चाय के साथ अपराध की खबरें पढ़कर अमित का मन खिन्न हो उठा—”देश गर्त में जा रहा है!”

​निराश अमित काम पर निकला। रास्ते में उसने देखा कि आनंद नाम के एक साधारण व्यक्ति ने एक राहगीर को कुछ बदमाशों के हमले से बचा लिया, हालांकि उसकी बाँह में गहरा कट लग गया। अमित ने चकित होकर पूछा, “बिना किसी लाभ के अपना नुकसान क्यों सहा?”

​आनंद मुस्कुराया और बोला—

​”वर्षों पहले आधी रात को एक अनजान लड़की का फोन आया। वह घबराई आवाज़ में बोली, ‘हेलो रघु!’ मैंने कहा, ‘रॉन्ग नंबर, मैं रघु नहीं हूँ!’ पर हताशा में डूबी वह लड़की रोते हुए बोली, “नहीं तुम्ही मेरे भाई रघु हो।” मैंने झुंझलाकर फोन काट दिया। अगले दिन समाचार में एक लड़की के साथ वीभत्स अपराध की खबर थी, जिसकी समयावधि उसी कॉल से मेल खाती थी।”

​आनंद का गला भर आया, “उस पश्चाताप में मैंने उस अज्ञात लड़की को बहुत ढूँढा। सफलता नहीं मिली, पर धीरे-धीरे मेरी तलाश एक शाश्वत सत्य पर जाकर समाप्त हुई—मुझे समझ आया कि वह लड़की कोई एक चेहरा नहीं, बल्कि समाज का हर पीड़ित व्यक्ति है। हर मनुष्य में वही एक चेतना विद्यमान है। उसके बाद मैं जहाँ जो बन पड़ता, निस्वार्थ सहायता करने लगा।”

​अमित स्तब्ध था। आज उसने अमित के रूप में अपने सपनों के भारत को देख लिया था। उसे समझ आया कि जब एक तरफ निराशाजनक खबरें आती हैं, तो उसी समय अमर भारतीय संस्कृति रूपी बीज से आनंद रूपी आशा का अंकुर फूट रहा होता है।

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Pradyumna Kumar Tiwari