चलो मणिपुर जाते है।
इस बार हम बदल जाते हैं,
चलो मणिपुर जाते हैं।
मणिपुर की इन वादियों के साए में,
खुद को किसी झील-सा गढ़ जाते हैं,
चलो मणिपुर जाते हैं।
ये पहाड़, ये हरियाली, ये पुराना पता,
फूमदी-सा तैरता ये मन मेरा।
कल्पनाओं के नीर में डूब जाते हैं,
फिर से एक बार मणिपुर जाते हैं।
मिट्टी की खुशबू, वो शंघाई और वो खामोशी,
बरसों बाद वहाँ जाने की खुशी।
इश्क़ तो बस एक बहाना है यहाँ,
हम तो यहाँ की मिट्टी में घुल-मिल जाते हैं,
फिर से एक बार मणिपुर जाते हैं।
फिर से एक बार बदल जाते हैं,
चलो मणिपुर जाते हैं।
इंफाल की गलियों की गूँज पुरानी,
खोंगजोम की वीर गाथाओं में ढल जाते हैं।
चलो, इस बार मणिपुर जाते हैं।
संगाई की आँखों का मासूम नज़ारा,
पहाड़ों की ओट से सूरज को प्यारा दिखाते हैं।
चलो, इस बार मणिपुर जाते हैं।
यहाँ का हर एक रास्ता रूह को छू जाता है,
बाँस के जंगल यहाँ हवाओं का संगीत बजाते हैं।
फिर से एक बार बदल जाते हैं,
चलो, इस बार मणिपुर जाते हैं।
रंग-बिरंगी शॉलें सदियों से दास्तान बुन जाती हैं,
लाई हराओबा संस्कृति की याद दिलाती हैं।
चलो मणिपुर जाते हैं।
फिर से एक बार बदल जा
ते हैं,
चलो मणिपुर जाते हैं।