दस्तूर-ए-इश्क
दस्तूर-ए-इश्क
नज़्म, गज़ल,कविता संग्रह
कलम से= प्रिंस मेहरा
लेखक के बारे में
नाम=प्रिंस मेहरा
जन्म=01अप्रैल 2003
शिक्षा: बी०ए राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अंबाला छावनी 2019-2022
एम०ए हिंदी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अंबाला छावनी 2022-2024
बी०एड कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय 2024-2026
पेशा=शिक्षक,लेखक
प्रथम संग्रह= दस्तूर ए इश्क
स्थान: झरौली खुर्द ,शाहाबाद मारकंडा, हरियाणा (136135)
प्रिंस मेहरा हिंदी भाषा के युवा कवि और लेखक हैं। “दस्तूर-ए-इश्क” इनका पहला कविता संग्रह है। इस किताब में इन्होंने इश्क, जुदाई, बारिश और यादों के एहसासों को सरल शब्दों में लिखा है।
ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं और मानते हैं कि शब्दों के जरिए दिल की बात सबसे आसानी से कही जा सकती है।
IG: @prince_mehra12
Email=princemehra040@gmail.com
समर्पण
उसके नाम
जिसने मुझे दर्द दिया
और मैंने उसे लफ्ज़
– प्रिंस मेहरा
अनुक्रमणिका
1. शीर्षक …………………………………
2. कवि परिचय ………………………
3. समर्पण ………………………………
4. अबर-ए-करम ………………………….
5. दुआ और न थी …………………………
6. दीवार-ए-ज़ीस्त …………………………….
7. गजल सी आँखे …………………………….
8. प्रेम और वासना की दहलीज …………….
9. मौत से मुलाकात ……………………………
10. दस्तूर ए इश्क …………………………….
11. चंडीगढ़: यादों का शहर …………………
12. इश्क की दुहाईया ……………………….
13. गवाही …………………………………..
14. इश्क की निशानी …………………………
15. दिसंबर का सच …………………………
16. इकरारनामा ………………………………
17. रिवाज ……………………………………
18. बदलता अंदाज ………………………..
19. हसीन वादियां ………………………..
20. दरार …………………………………….
21. तानाशाही …………………………………
22. जहर-ए-हिज्र …………………………….
23. पत्थर बनाम इंसान ………………………..
24. राह-ए-वफ़ा के मुसाफ़िर …………………
25. इश्क की तौहीन …………………………….
26. दहलीज़ के पार …………………………….
27. अधूरी राह की तहरीर ………………………
28. इल्तिजा…………………………………..
29. शब्दार्थ…………………………………
Copyright © 2026 [प्रिंस मेहरा]
सर्वाधिकार सुरक्षित
इस पुस्तक के किसी भी अंश को लेखक की लिखित अनुमति के बिना
किसी भी रूप में पुनरुत्पादित या संचारित नहीं किया जा सकता।
पहला संस्करण: 2026
प्रकाशक: [प्रिंस मेहरा]
अबर-ए-करम
ये अबर-ए-करम जो आज इस शिद्दत से बरसा है,
दिल मुद्दतों बाद फिर किसी की याद में तड़पा है।
हर इक बूंद में छुपा है इक गुज़रा हुआ लम्हा,
ये मौसम-ए-गुल है या हिज्र का कोई सन्नाटा?
वो तेरी ज़ुल्फ़ों से पानी का ढलकर बिखर जाना,
वो छोटी-सी छतरी में सिमटकर मेरा सुकूँ पाना।
वो दीद की हसरत, वो ख़ामोश सी गुफ़्तगू,
आज भी रवाँ है रगों में बनके तेरी जुस्तजू।
अब तो महज़ एक अक्स है जो इन बूंदों में तैरता है,
मगर ये नादान दिल आज भी उसे सच समझ बैठता है।
कागज़ की वो कश्ती तो कब की ग़र्क़ हो गई ‘प्रिंस’,
पर ख़्वाहिशों का ये दरिया आज भी कहाँ संभलता है
दुआ और न थी
नम-सी फ़िज़ा थी, कोई सदा और न थी,
बाराँ थी मगर तेरी अदा और न थी।
बूँदों ने कई बार मेरे दिल को पुकारा,
उस वक़्त तेरी याद के सिवा और न थी।
ख़ुश्बू-ए-गुल-ओ-ख़ाक ने दिल लूट लिया यूँ,
इस रूह को फिर कोई दवा और न थी।
भीगी हुई राहों पर तेरी याद ठहरी,
उस शाम मेरी आँख में घटा और न थी।
बादल भी बहुत रोए, हवा भी रही ख़ामोश,
इस दर्द की कोई भी सदा और न थी।
हम हिज्र की बारिश में यूँ तन्हा ही रहे,
तक़दीर में मिलने की रज़ा और न थी।
‘प्रिंस’ आज भी बाराँ में तेरा ज़िक्र रहा,
इस दिल की दुआ तू थी, दुआ और न थी।
दीवार-ए-ज़ीस्त
दीवार-ए-ज़ीस्त से एक और ईंट सरक कर ख़ाक में जा मिली,
और कम-फ़हम लोग इसे जश्न-ए-विलादत का नाम दे रहे हैं।
उम्र की इस जर्जर इमारत के गिरते हुए कंगूरों को नहीं देखते,
वो नादान, इसे महज़ सालगिरह की एक हसीन शाम कह रहे हैं।
ज़िंदगी की तल्ख़ियों ने जो झुर्रियां रूह पर उकेरी हैं,
उन्हें दुनिया वाले तज़ुर्बे का एहतराम कह रहे हैं।
तन्हाई की शब-ए-तारीक में जो ख़ामोश अश्क बहे थे,
प्रिंस, उसे लोग महज़ सुख़नवरी का अंजाम कह रहे हैं।
हर ढलते सूरज के साथ मयस्सर होती इस मुख़्तसर सी मोहलत को,
वो बे-ख़बर, क़ामयाबी का कोई नया पैग़ाम कह रहे हैं।
मेरी हर तहरीर में जो सिसकते हुए यथार्थ का लहू है,
उसे महफ़िल के मुसाहिब, सिर्फ़ लफ़्ज़ों का निज़ाम कह रहे हैं।
जो ईंट गिरी है, वो मेरी उम्र का एक कीमती हिस्सा थी,
मगर ये सादा-लौह लोग, इसे ज़िंदगी का इनाम कह रहे हैं।
ग़ज़ल सी आँखें
ये जो ग़ज़ल सी आँखों में, काजल की गहरी धारी है,
जैसे कोरी काग़ज़ पर, कोई नज़्म उतारी है।
माथे की वो छोटी बिंदिया, चंदा का इक टुकड़ा है,
या फिर किसी मुसव्विर ने, ये चाँद सा चेहरा गढ़ा है।
सबा सी तेरी आहट है, जो मन के उपवन डोलती,
मिश्री सी तेरी बातें हैं, जो कानों में रस घोलती।
जुल्फें जैसे बादलों का, कोई शब-ए-साया हो,
जैसे किसी तपस्या का, फल मैंने अब पाया हो।
गुलाबी सुर्ख ये आरिज़, जैसे खिलता हुआ कोई चमन,
तेरी हया की लाली से, महक उठता है मेरा मन।
जब झुकती हैं ये पलकें, तो शाम ठहर सी जाती है,
जब उठती हैं ये आँखें, तो सुबह मुस्कुराती है।
तेरी सादगी के आगे, सब जेवर फीके लगते हैं,
तेरे नूर के आगे, ये सितारे फीके लगते हैं।
तू चलती है तो लगता है, कोई लहर मचलती है,
तेरी इक नज़र की खातिर, मेरी साँसें चलती हैं।
तेरी मुस्कान में शिद्दत है, तेरे लफ़्जों में पाकीज़गी,
तुझसे ही मेरा ‘आज’ है, और तुझसे ही मेरी ज़िंदगी।
न कोई हुस्न की हसरत, न परियों का ख़याल है,
बस तू ही मेरी हकीक़त, तू ही मेरा जमाल है।
तेरी रूह की पाकीज़गी को, मैं इबादत कहता हूँ,
तुझसे जुड़ी हर याद को, मैं अपनी विरासत कहता हूँ।
तू पास रहे या दूर रहे, तेरा अक्स मेरे साथ है,
ये इश्क़ नहीं तो और क्या, बस तू ही मेरी कायनात है।
प्रेम और वासना की दहलीज
शुरुआत सादा थी, जैसे कोरे काग़ज़ पर पहली लकीर,
वह प्रेम था, जिसमें रूह की रूह से तक़दीर थी।
पर धीरे से जिस्म की खुशबू ने कमरा घेर लिया,
जहाँ समर्पण होना था, वहाँ वासना ने फेर लिया।
नज़रों में जो इबादत थी, वो अब प्यास बन गई,
रूह की गहराई, बस खाल की छुअन की आस बन गई।
हमने समझा था कि ये मिलन का ही एक विस्तार है,
पर कौन जानता था, कि वासना प्रेम का सबसे बड़ा शिकार है।
फिर मंज़र बदला, और रिश्तों में ‘मुनाफ़ा’ झाँकने लगा,
सच्चापन थका तो, चेहरा मुखौटों के पीछे भागने लगा।
तुमने मेरी वफ़ा की कीमत, अपनी सहूलियत से लगाई,
बाज़ार सजाया एहसासों का, और रसीदें मेरे नाम आई।
हर ‘आई लव यू’ के पीछे एक अदृश्य सौदा था,
रिश्ता अब रिश्ता नहीं, बस एक कमर्शियल पौधा था।
तुमने मेरी धड़कनें बेचीं, अपनी ज़रूरतों के बाज़ार में,
मैं बिकता रहा, सरेआम, तुम्हारे हर झूठे इक़रार में
जब तिजोरी भर गई, तो तुमने रुख़ मोड़ लिया,
वफ़ा का पुराना घर, बड़ी बेरहमी से तोड़ दिया।
धोखा कोई अचानक हुआ हादसा नहीं था तुम्हारा,
वो तो एक सोची-समझी साज़िश का किनारा था।
जिस हाथ को पकड़ा था मैंने खुदा मानकर,
उसी ने पीठ में खंजर उतारा, मुझे अपना जानकर।
झूठ के रेशमी पर्दों में तुमने सच को दफ़ना दिया,
मेरे अटूट विश्वास को, मिट्टी मे मिला दिया
अब सन्नाटा है, और एक खाली कमरा मेरा ठिकाना है,
विरह की इस आग में, मुझे खुद को ही जलाना है।
बिछड़ना मौत नहीं होता, पर मौत से कम भी नहीं,
इस तन्हाई के ज़हर का, दुनिया में कोई दम भी नहीं।
तुम तो चले गए, अपना हिस्सा समेट कर,
मैं यहाँ खड़ा हूँ, अपनी ही बर्बादी की वसीयत लपेट कर।
आँखें थक गई हैं, रास्तों को निहारते-निहारते,
साँसें भारी हैं, बीते हुए पलों को पुकारते-पुकारते।
पर ये यादें… ये स्मृति, बड़ी ज़ालिम चीज़ है,
धोखे की ज़मीन पर भी, ये प्रेम का ही बीज है।
तुम्हारा वो हँसना, वो हाथ छुड़ाकर चले जाना,
भूली हुई गलियों में, फिर से लौट कर आना।
सब धुंधला है, फिर भी सब कुछ साफ़ दिखता है,
मेरे भीतर आज भी, तुम्हारा ही नाम बिकता है।
तुम घाव हो, तुम मरहम हो, तुम ही मेरी हार हो तुम,
तुम प्यार की हसीन वादी
दुनिया के लिए खूबसूरत बहार
हो तुम
न सोचूं तुम्हे
फिर भी मेरा एक ख्याल हो तुम
तुम्हारे लिए तो व्यापार है इश्क़
पर मेरा तो इकलौता प्यार हो तुम
मौत से मुलाकात
वो सिरहाने आकर बैठ गई, चेहरे पर ज़रा नकाब न था,
मेरी आँखों में खौफ़ सही, पर उसके पास भी जवाब न था।
वो बोली— “प्रिन्स, सफ़र ये पूरा हुआ, अब चलने की तैयारी है,”
मैंने मुस्कुराकर कह दिया— “अभी मेरी कलम की बारी है।”
मैंने पूछा— “क्या ले जाओगी, ये शोहरत या ये नाम मेरा?”
वो बोली— “मिट्टी का ये जिस्म ही बस, होगा अब ईनाम मेरा।
न दौलत तेरे काम आएगी, न ऊँचे ये महल तेरे,
साथ वही बस जाएगा, जो अच्छे रहे अमल तेरे।”
मैंने कहा— “ज़रा रुक जाओ, अभी इक नज़्म अधूरी है,
सच्चाई की इस दुनिया में, अभी जंग बहुत ज़रूरी है।
मैंने कलम उठाई है उनके लिए, जो अब तक खामोश रहे,
वो दर्द अभी बाकी है मेरा, जो अब तक बे-आगोश रहे।”
वो हँसी और फिर पास आकर, धीमे से ये बोल गई,
मेरे वजूद की हर एक परत, वो पल भर में ही खोल गई।
“अरे पागल! ये दुनिया तो बस, इक रैन-बसेरा है,
यहाँ जिसे तू ‘अपना’ कहता, वो बस एक अंधेरा है।”
“तू लिखता है ताकि तेरा नाम, सदियों तक गूँजे यहाँ,
पर देख ले उन पत्थरों को, जहाँ राजाओं के निशान कहाँ?
मैं आती हूँ तो वक़्त की, सारी घड़ियाँ रुक जाती हैं,
बड़े-बड़े मगरूरों की भी, गर्दनें यहाँ झुक जाती हैं।”
मैंने अपनी कलम थाम कर, फिर से अपना सर उठाया,
मौत की उस सर्द हवा को, अपनी गर्मी से डराया।
“सुन! तू जिस्म को ले जा सकती है, पर सोच को कैसे मारेगी?
मेरी नज़्मों की ये आग देख, तू खुद ही हार स्वीकारेगी।”
“मैं ‘प्रिन्स’ हूँ, मेरी रूह में, सच का एक समंदर है,
तेरा खौफ होगा बाहर, पर सुकून तो मेरे अंदर है।
तू अंत की एक लकीर सही, पर मैं वो कहानी हूँ,
जो ख़त्म होकर भी नई है, मैं ऐसी ही ज़ुबानी हूँ।”
वो चकित थी मेरी हिम्मत पर, या मेरी नादानी पर,
फिर छा गई इक खामोशी, मेरी लिखी इस कहानी पर।
वो गई नहीं, वो रुक गई है, मेरी कलम की धार देख कर,
शायद वो भी पिघल गई, मेरा ख़ुद से इतना प्यार देख कर।
अब मौत कोई दुश्मन नहीं, बस एक पुराना साथी है,
ज़िंदगी की इस अंधेरी रात में, बस वो ही एक भाती है।
मैं लिख रहा हूँ आखिरी सफ़ा, बिना किसी मलाल के,
क्योंकि ‘प्रिन्स’ जीत गया है, मौत के इस जाल से।
दस्तूर ए इश्क
आखिर उदास क्यों है तू
एक मौसम बाद सब को बदलना ही है
बदलता है मौसम प्यार का
आती है धुंध सितम की
आज जो आग सबको लगती है प्यारी
कल वो ही लगेगी पराई
आज जो है महबूब
कल हो जायेगा बेवफा
दिखेंगे वो हमारे दुख के आलम में
जो आज आते है आज हसीन सपनों में
आज सुना रहे जो हमारे दासता ए मोहब्बत की
कल वो बताएंगे हमे ही बेवफा
तो क्यों है उदास ए दिल
ये तो दस्तूर ए इश्क है
महबूब एक समय बाद दूसरा हमसफर चुन ही लेगा
चुन लेगा साथ किसी ओर का
अच्छे लगने लगेंगे गैर उनको
उनको छोड़ो तुम भी चुन ही लोगे किसी ओर को
तो क्यों ये उदासी क्यों ये मातम
जिंदगी लंबी है अभी बहुत
कतार में है सैकडो आशिक
जो दिल तुड़वाएगे ओर तोड़ेंगे
ले प्रेरणा एक फूल से
जिसे पता है की कल तोड़ा जायेगा उसे
फिर भी वो कली से बनता है न फूल
सीख ले आग से कुछ
जो खुद जलकर बनती है राख
पर कर देती है कई घर में प्रकाश
तू भी बन ऐसे ही कुछ खास
ये दुनिया है चलती रहेगी यूंही
यहां कोई न पूछेगा
हाल तुम्हारा
कोई न पूछेगा
क्यों है उदास….✨
चंडीगढ़: यादों का शहर
था काफी खुश आया जब था शहर में तेरे,
था पास सब कुछ मेरे मेरी हसीं खुशी तेरी यादें।
आलम था चारों तरफ प्यार का,
जाते वक्त जो कम्भक्त बदल गया सितम में।
रहेगा याद तेरा चंडीगढ़ शहर और इसकी ये हसीन यादें,
मगर अब उन रास्तों पर मेरी तन्हाई की बातें होंगी।
सेक्टरों की उन गलियों में अब भी तेरी खुशबू है,
सुखना की लहरों में जैसे ठहरी हुई कोई आरज़ू है।
जो कभी सुकून था, अब वो शोर बन कर चुभता है,
तेरी यादों का समंदर अब मेरे अंदर ही डूबता है।
नफरत नहीं है तुझसे, बस खुद से अब ये गिला है,
कि जिस शहर ने सब कुछ दिया, वहीं मेरा सब कुछ लुटा है।
नशा उतरा तो देखा कि हाथ खाली थे मेरे,
पीछे छूट गए वो हसीन ख्वाब और वो सवेरे।
अब मुड़कर न देखूँगा इन चिनार के पेड़ों को,
खामोश कर चला हूँ अपनी धड़कन के घेरों को।
तू खुश रहे अपने शहर में, यही दुआ करता हूँ,
पर ‘नशा’ से ‘नाश’ तक का ये सफर अब खत्म करता हूँ।
इश्क की दुहाइयां
इश्क़ की दुहाइयां देता है ये जग मुझे
जिसने अभी तक देखा ये संसार नहीं
कहता है मुझे ये जग पागल
अभी तो किया उस हद तक प्यार नहीं
करता है शरारतें लेकर नाम तेरा
छुपा हु तेरी खामोशी में कही
शर्म की ये जंजीरें तोड़कर
सामने मुझे लाती क्यों नहीं
लोक लाज शर्म से इतना क्यों हो घबराती
किया है इश्क़ जब
मुझे खुल कर अपनाती क्यों नहीं
मुकम्मल ए इश्क़ अपना भी हो जाए
घर अपने तुम बताती क्यों नहीं
अभी नहीं अभी नहीं
कही देर बहुत न हो जाए
कलम पर है जोर मेरा
कही प्यार पर हावी न
हो तुम्हारा परिवार जाए
तुम जोड़ दोगी हाथ सामने मेरे
मेरे तो बिन पानी की
मछली सा हाल होगा
लोग हसेंगे मारेंगे ताने
तुम मुझे इस हाल पर न ले आना
म टूट जाऊ किसी तारे की तरह
उसे पहले आकाश में मुझे चमका दे
न दे मुझे दुहाइयां ये जग
इस काबिल मुझे कहने का हक दिला दे
प्रिंस 💗🌼
गवाही
लिखना जो चाहा तुझे अल्फाजों में
मेरी जिंदगी की ये सारी किताब भर गई
किस्से लिखता गया तेरी वफ़ा के
न जाने कब ये कायनात बीत गई
गांव से शहर से न जाने
कब ये देश की बात बदल गई
मैं तो था अभी नींद में गहरी
न जाने कब वो सुनहरी रात गुजर गई
खोना नहीं था मैं चाहता तुम्हे जिंदगी में कही
पर सुबह होते ही मेरी आंख न जाने कैसे बेवफाई कर गई
वाकई ये कोई कहानी नहीं मेरी पूरी जिंदगी की गवाही हैं
मैं ही मुजरिम मैं ही वकील
वो कुछ ही पल मेरी जिंदगी की अदालत में
ज़ज बनकर सजा ए मौत सुना गई
अपनी दलील में मैने जब चुप्पी तोड़ पूछा कसूर मेरा
वो बिन मांगे दी इज्जत और प्यार को गुनाह बता बैठी
मैने भी हंसते हंसते कबूल किया अपना गुनाह
खुश थी वो छोड़ कर मेरा दामन
तो मैं क्यों होता निराश
भंवरा आखिर कब तक करता
एक ही फूल के दोबारा बनने का इंतजार
#प्रिंस💚
इश्क की निशानी
किस्से बहुत सारे सुने थे
हीर रांझा और चुन्नू के
आज खुद पर बनी तो समझ आया
इश्क नहीं वो चिड़िया
जो चहकती है सोने की दीवारों में
न किसी राजा के दरबार में
इश्क नाम है उस चिड़िया का
जो रहती है सदा ख्यालों में
टूटे सपनों के मकानों में
कब्रों में मयखानों में
पूरा जो हुआ वो कभी इश्क था ही नहीं
इश्क की एक निशानी बोलूं तो
हमेशा रही तड़प और अधूरापन में
एक शायरी इसी में मैंने डाली
कागज पर लिख एक सपना मैने फाड़ दिया
इश्क इतना किया कि इश्क ने मुझे मौत के घाट उतर दिया
~प्रिंस🌸💚
दिसंबर का सच
एक बात काफी समय से सुनते आ रहा था
दिसंबर के बिछड़े हुए आशिक़ कभी नहीं मिलते
लेकिन सच्चाई इसे काफी अलग है
लोगों का अनजान से जान बनना
जान से फिर महीने सालों बाद अनजान बनना
ये चकर सारा प्यार में मैने पाया
होश खोके जिसके पीछे था मैं इतने सालों से पागल
उसी ने मुझे धक्का देकर होश में लाया
खेल सारा मतलब का था मैं जिसे समझ न पाया
इश्क़ कितना खूबसूरत शब्द है न?
लोगों ने इसका पर आज मजाक बनाया
जीने का तौर तरीका सिखाकर
मरने का नया ढंग दिखलाया
के न कर यकीन ए दिल
बहुत पछताएगा
टूटेगा मरेगा रोने को जी चाहेगा
दुनियां देगी ताने प्रेम मार्ग तुम्हे तड़पाएगा
दिसंबर का तो नाम वैसे ही बदनाम है जनाब
तेरा महबूब ही तुम्हें दुनिया के रंग ढंग तौर तरीके
और घुट घुट कर मरना सिखाएगा
~प्रिंस🌸💚
इकरारनामा
मैं लिखूंगा तो बेहिसाब लिखूंगा
तेरे ऊपर एक पर्ची नहीं पूरी किताब लिखूंगा
न डर इतना तेरे धोखे को न सरेआम लिखूंगा
पर किए वादे सपने और खूबसूरत यादों की बहार लिखूंगा
जिंदगी में आई अनेक खुशियां उन खुशियों में एक में तेरा नाम लिखूंगा
वो लंबी दूरियां घंटों के सफर को यादगार लिखूंगा
छोड़ कर चली गई तू बेशक मुझे
मैं फिर भी तुम्हे बेइतहा प्यार लिखूंगा
जिस दिन फूट पड़ी ये इश्क की ज्वाला
तेरे ऊपर एक पर्ची नहीं पूरी किताब लिखूंगा
इतनी जो मोहब्बत की थी तुमसे
उस समय का इंतजार लिखूंगा
मेरे नसीब में न था मिलना तुमसे
फिर भी जो दोस्त बनकर मिला उसे प्यार लिखूंगा
दूरियां कुछ मीलों की नहीं
सात समंदर पार लिखूंगा
देख कर तेरी तस्वीर को मुस्कुराना
अपने पागलपन का ये हाल लिखूंगा
तेरी मर्जी नहीं मजबूरी का नाम लिखूंगा
जिस दिन तुम पर लिखूंगा
एक पर्ची नहीं पूरी किताब लिखूंगा
रास्तों में आई तकलीफों को कांटों की दीवार लिखूंगा
तेरे मिलन को सावन की मनमोहक बहार लिखूंगा
हमसफर बनना न था किस्मत में हमारी
किस्मत को देकर दोष तुम्हे मोहब्बत का पाठ लिखूंगा
तेरी कमी ने निचोड़ दिया मेरी सुख ओर खुशियों को
फिर भी तुम्हें सुकून का एक नाम लिखूंगा
फूटा हु अंदर से हिसाब न तुम्हे हाल ए दिल का
टूटता हु जब अंदर से निकलते है कुछ अल्फ़ाज़
“कलम गवाह है कि मैंने सिर्फ दर्द नहीं, वफ़ा का हिसाब लिखा है,
दुनिया जिसे ‘अधूरा’ कहती है, ‘प्रिंस’ ने उसे मुकम्मल इश्क का खिताब लिखा है।”
यू ही नहीं शुरुआत से आ रहा हूं कहता शुरू से
लिख दूंगा पूरी किताब…….📚❤️🧿
प्रिंस💗
रिवाज
मैं निकला हु जिन रास्तों पर
यहां मुझे मेरे जैसा कोई दिखता क्यो नहीं
मैं मिलता हूं जिस तरह समाज से पीड़ित उन इंसानों से
मुझे कोई मिलता क्यों नहीं
हालत हो जाती जब बद से भी बदतर
थक कर हो जाता हूं चूर
मैने जिन रास्तों को बनाया
वो ही क्यों अनजान सा करने लगते है बर्ताव
मैं बिछा कर गया था जहां फूल
क्यों वापस आते ही वो बन जाते शूल
देते दुख और पीड़ा इतनी
भूलने को करते मजबूर उन पलों को
जिन्हें मैने था कभी सजाया
दिन जब थे उन पर भारी
मैने अपनी खुशी की थी इन पर कुर्बान
आज जब एकाएक मुझे इनकी पड़ी जरूरत
मुझे बना दिया एक पल में अनजान
सबको खुश करता
ए दिल मैं तेरे से गद्दारी कर बैठा
वो रास्ते जो मैने थे बनाए
वो समाज के रिवाज से वफादारी कर गए
(रिवाज) हा वो ही रिवाज अपना अच्छा समय आने पर
अच्छा समय लाने वालों को ही मार के ठोकर जिंदगी से निकालना
दस्तूर ए इश्क मैने भी पाया
एक सवाल बार आता रहेगा ज़हन में
जिसके बुरे वक्त को तुमने अपना काम नाम सब छोड़ कर
जीने का एक रास्ता दिखाया
उसी ने तुम्हे क्यों ठुकराया ????
~प्रिंस💚🌸
बदलता अंदाज
बदल तो रहा था अंदाज उनका
हमे लगा है ये प्यार
चुराने लगे थे वो आंखे
मुझे लगा है लज्जा के आसार
छोड़ दिया उन्होंने बताना हक
हमे लगा समय से है लाचार
था प्यार बेशुमार
शायद बताने का नहीं था विचार
आखें चुराई चुराया मेरे हिस्से का प्यार
बैठ सुनसान राह में कर रहा इंतज़ार
उसने था साथ छोड़ा संभाला इस कविता ने हाथ
कहा न हो निराश हूं साथ तेरे
जब तक तेरी कलम में है प्राण
उन्होंने था दामन छुड़ाया
बांध दिया मैने कुछ लाइनों में
न हो ए महबूबा उदास
नही लिखूंगा तेरी कोई बुराई
जिसे हो दुनिया के सामने तू शर्मसार
बस लिखूंगा कुछ ऐसा कोई न निकले मेरी तरह इस राह पे
जो खाके चोट लिख न पाए
खुद के ही अल्फाज
रहेगी कदर तेरे प्यार की
बेशक तू बदलने लगी हो व्यवहार
काश जो दिल में है कभी बता भी पाती मुंह से
तो न होना पड़ता मुझे चोटिल यूं दिल से
जख्म भी मिला ऐसा छोड़ दिया करना ऐतबार
माना कि नही थी बात वस में तेरे
पर ऐसे छोड़ के भी कोई जाता है क्या??
निकली विदेश कर कत्ल दिलों के दिलदार
दूरी न कमजोर कर पाएगी मेरा ये प्यार
दूरियां शहर में आए या आए देश में
नही रखती कोई मायने जब हो तरफ दोनो को प्यार
आज हूं कुछ टूटा सा
खुद से ही रूठा सा
है ख़ुद से ही बार एक ही सवाल
कम्बक्त क्यों किया प्यार
मिलना न था जब मुकमल
क्यों बनाया यादों का ये पहाड़
जिसकी ऊंचाई आसमां से भी अधिक
गहराई समंदर से भी ज्यादा
समृति में निकल जायेगी लगता ये जवानी
जिस रफ्तार से निकल रही हाथों से
लगता है वर्ष 2 वर्ष तक निकल जाएगी सांस
और हड्डियों से पानी
याद आयेगी फिर ये जवानी
याद आऊंगा फिर मै तुम्हें
यादों से होगी तकलीफ तुझे बहुत
रोएगी पछताएगी पर अफ़सोस
कुछ कर न पाएगी
आएगा गुस्सा तुम्हे अपने ही फैसलों पर
कि… क्यूं था बदला मैने ये अंदाज
याद आयेगी वो गलियां
कॉलेज में खिलती वो खूबसूरत कलियां
जिन्हें तोड़कर लगाता था कभी तुम्हारे बालों में
याद आयेगा पुस्तकालय जो था मिलने का बहाना
याद आयेगा वो शहर अंबाला भी
जहा किया था प्यार का इजहार
आयेगा याद अंबाला छावनी का प्लेटफार्म नंबर 3
और लोगों की वो लंबी सी कतार
जिनमे अक्सर उलझ कर होती थीं तू निराश
तोड़ देगे तुम्हे अंदर से जो थे मुलाकातों के द्वार
बनना था कभी जो खूबसूरत सफर 3 साल का
उसे किया तेरे एक फैसले ने खराब
जहान को खुशियों में देख कोसोंगी खुद को
नोचोगी अपने बाल
आएगी घिन इनसे ही
जो लगते है प्यारे आज ये गाल
जा चुका होगा तब तक ये हुस्न ए कमाल
कोमल वृक्ष की लताओं जैसे तेरे बाल
नागिन की जैसी तेरी आंखे
और हिरनी जैसी चाल
…!!!!
~प्रिंस🌼
हसीन वादियां
घिरा हूं इन हसीन प्यार की वादियों में
कोई राह दिखाएगा क्या?
जब हो जाऊंगा तन्हा
कोई उदास पड़े को उठाएगा क्या?
नही कोई भ्रम मुझे
इश्क बर्बाद कर ही देगा
कोई आबाद करने आएगा क्या?
निकला हू मैं राह पर इश्क की
लूटा इज्जत ईमान
बैठा है रख नजर मुझपर
ये पूरा संसार
इंतजार में हैं कामयाबी की नहीं
बल्कि देखने को मेरी नाकामयाबी
हूं जानता मैं मिलेंगे इस राह पर कांटे सिर्फ
हंस कर भागा फिर भी जा रहा हूं
गिरता उठता रुकता भागता
न लगा पाया इस दौड़ पर विराम
विराम तो है बात दूर की
न लगा पाया लगाम
खुद की ख्वाइशों पर
हो जाता हूं तन्हा जब
थम लेती है एक विश्वास की डोर
जो कुछ क्षण मुझे लेती है रोक
पर न रोक पाती उसकी याद के समंदर को
ये समंदर मुझे खुद में जा रहा है समाए
कोई तो नादान दिल को ये समझाएं
नही है वो कोई औषधि न ही कोई प्राण
समझाएं दिल को आके कोई तो
की क्यों घटा रहा है अपना जीवन काल
भटक जायेगा तू इन भीड़ भरी महफिल मे
कोई इस दिल को समझाएगा क्या?
@प्रिंस मेहरा🌺