Views 451चलो चलेंचलो चले पंखों की उस उड़ान में मेहनतकश करेंगे ईंट को मकां में जाने अंखियां कहां है रोई सागर ने अपनी लहरें है खोई झिलमिल तारों से परे तेरे पंखों की उड़ान है सोई। चलो चले नींद से जागे तेज़ में रवि से भी आगे सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता के अंधेरे से चल उजाले मांगे। अपनी आंखों को विराम दो पंखों को एक अब इनाम दो उड़ान की 21वीं शताब्दी में हमारी भारत मां का सम्मान हो। अखबार बेचने से लेकर अब्दुल कलाम तक ठोकर से होकर ” मिसाइल मैन” सलाम तक अब गिनना न भूले दुनिया हमें लहरों को पार कर,एक ऊंची उड़ान तक चलो चले पंखों की उस उड़ान में मेहनतकश करेंगे ईंट को मकान में ।। Related Leave a ReplyCancel reply