तबायफ माँ भले ही हो, पर माँ तो माँ ही होती है।
कुछ अलग अनोखा भाव आया,
जो इस कविता के माध्यम से प्रस्तुत है…
तबायफ माँ भले ही हो,
पर माँ तो माँ ही होती है।
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कई पुरुषों की वासना पूरित करती है,
एक स्त्री भले ही तबायफ कहलाती है।
भोगी पुरुष रहा हमेशा पर्दे के पीछे,
बदनामी पूरी स्त्री के नाम ही आती है।
पता नहीं किसके पाप का फल,
उसकी कोख में पलता है।
हर धड़कन में उसका दिल,
यह सवालात फिर करता है।
बेटी के जन्म लेने पर,
अनजाने भय से सहमती है।
बच्ची पर जुल्म की आशंका से,
भयभीत सदा वह रहती है।
रातों की काली छाया से,
सदा वह डरा करती है।
दरिंदों की टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयों से,
सदा वह भय खाती है।
सौ-सौ अपमान चुपचाप,
भले ही तबायफ माँ सह लेती है।
बच्ची की अस्मिता के लिए,
वह अपना आँचल फैलाती है।
समाज ने उसको दुत्कारा भले ही हो,
‘सखी’ बेटी को बचाती है।
समाज समझे या ना समझे,
यही माँ की ममता कहलाती है।
तबायफ नहीं वह पहले,
अपने बेटे के लिए माँ होती है।
वहशियों से रखकर के दूर,
‘सखी’ माँ उजला भविष्य बनाती है।
जिसको तबायफ नाम दिया,
‘सखी’ वह भी एक माँ होती है।
हाँ ‘सखी’ माँ तो सिर्फ, फिर माँ ही होती है।
हाँ ‘सखी’ माँ तो सिर्फ, फिर माँ ही होती है।