नारी + पुरुष
नारी + पुरुष
“पूरक होकर भी लड़ते क्यों?”
पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं
वो शिव हैं तो वो शक्ति है,
फिर कैसी ये विरक्ति है?
एक नदी है, एक किनारा,
दोनों से ही बनता धारा।
तुम अधूरे, हम अधूरे,
मिल के ही हम दोनों पूरे।
लड़ते हैं हम इसलिए ‘सखी’,
भूल गए हैं हम पूरक हैं,
एक ही जीवन के दो पन्ने,
एक ही गीत के दो मुखड़े हैं।
- – सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’