प्रभु की कृपा-कलम
प्रभु की कृपा-कलम
जब शब्द थे मौन, भाव थे अनबने
मन के पन्ने कोरे, सपने थे अधबने।
तब प्रभु की कृपा ने, हाथ मेरा थाम लिया,
कलम को दिया प्रकाश, लेखन का काम दिया।।
अंधेरे में भटकते, मन को राह दिखाई,
हृदय की वीणा पर, शब्दों की लय बिठाई।।
जो बातें न कह सका मन, वो स्याही ने कह दीं,
प्रभु ने ही उँगली पकड़, लेख-कविताएँ लिखवा दीं।।
अब हर अक्षर में, उनका नाम बसा है,
हर पंक्ति में आशीर्वाद का, आभास सजा है।।
‘सखी’ कलम नहीं, बस उनका करिश्मा है,
जो लिखती हूँ मैं, वो सब उनका ही लिखा है।।
लेखिका-कवयित्री तो मैं, बस एक निमित्त बनी हूँ,
प्रभु की कृपा से ही, लेखन की कल कलम बनी हूँ।
– सुमित्रा गुप्ता साखी