माँ को सबसे प्रिय क्या है?

माँ को सबसे प्रिय क्या है?

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माँ को ना चाहत धन वैभव,

माँ को ना जग सम्मान।

सुत सच्चे हों, सरल हृदय हों,

बस इतना सा अरमान।

 

नहीं रत्न-मोती की इच्छा,

नहीं महलों का मान।

सुत घर आए साँझ ढले जब,

खिल उठता मुख-प्राण।

 

ऊँचे पद से अधिक जरूरी,

सुत का कोमल नेह। 

माँ के मन का एकमात्र धन,

सुत का सच्चा स्नेह।

 

थाली सूनी चल जाएगी,

चल जाएगा श्रृंगार।

सुत की मीठी बोली भर दे,

माँ का सारा हृदय द्वार।

 

दौलत, शोहरत सब क्षणभंगुर,

झूठा जग व्यवहार।

सुत रहे सन्मार्गी सदा ही,

यही अमर उपहार।

 

थककर जब संसार सताए,

लौटे सुत घर-द्वार।

माँ के लिए वही क्षण होता,

‘सखी’ सबसे बड़ा त्यौहार।

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Sumitra Gupta