माँ पर जो उठाते हाथ हैं

माँ पर जो उठाते हाथ हैं

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जो संतान उठाती माँ पर हाथ है।

मिलता नहीं ईश्वरीय कृपा का साथ है।

 

वे जीवन में विषैले बीज हैं बोते

अपने जीवन की सुख समृद्धि हैं खोते

 

रातों की नींदें जिसने अर्पित कर दीं

उसके जीवन में तुमने आहें क्यों भर दीं?

 

माँ तो जीवन की है प्रथम पाठशाला ।

ममता जिसकी अमृत-सी है मधुशाला ।

 

 

उसकी गोद में था स्वर्ग समाया ।

उसकी लोरी में था जग मुस्काया।

 

जो हर दुःख में ढाल बनती थी।

अपना सर्वस्व लुटाया करती थी।

 

तुम माँ पर क्रोध का वज्र चलाते ।

पुत्र होकर तुम कृत्घ्नी पुत्र कहलाते।

 

कृतघ्नता का ऐसा कलंक लिए फिरते।

जीवन भर तुम सिर धुन-धुन पछताते ।

 

माँ के आँसू जब धरती पर हैं गिरते।

कण-कण भी फिर मौन हैं सिसकते ।

 

ऐसे पापों का बोझ धरा ना सह पाती।

ऐसी संतानों की किस्मत भी रूठ जाती।

 

सम्मान करो उस जननी का,

जिससे जीवन- धारा बहती है।

 

माँ के चरणों में ही तो ‘सखी’,

हर सुख-समृद्धि छुपी रहती है।

 

माँ का आदर ही सच्चा धर्म है

यही समझना सच्चा मर्म है।

 

जो अपनी माँ को पीड़ा देता है।

उसका जीवन ही व्यर्थ कर्म है।

 

 

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Sumitra Gupta