अंतर्मन से अनंत तक मृत्यु का जन्म क्यों और कैसे हुआ?
लेखिका की कलम से,
प्यारे मित्रों,
यह अध्याय मेरी आने वाली पुस्तक “अंतर्मन से अनंत तक” से है। इस कहानी में — मृत्यु का जन्म क्यों और कैसे हुआ?
मैं एक गहरा रहस्य साझा कर रही हूँ। अगर जन्म एक वरदान है, तो मृत्यु को क्यों आना पड़ा? मैं अपनी पुस्तक के कुछ अध्याय यहाँ आप सबके साथ साझा करती रहूँगी।
आभार सहित,
सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’
मृत्यु का जन्म क्यों और कैसे हुआ?
प्यारे मित्रों! आज मैं आपके सामने एक गहरे और शाश्वत रहस्य को उजागर करने वाली कथा प्रस्तुत कर रही हूँ – मृत्यु के जन्म की कथा।
मृत्यु का जन्म
एक समय था जब सृष्टि में मृत्यु का अस्तित्व ही नहीं था। प्राणी जन्म लेते थे, पर कोई मरता नहीं था। यह सुनने में आश्चर्यजनक लग सकता है, पर ऐसा ही माना जाता है। जरा सोचिए – अगर जन्म अनंत रूप से होते रहें और कोई कभी मरे ही नहीं, तो पृथ्वी का क्या होगा? मृत्यु एक ऐसा शब्द है जो मानव मन को भय, शून्यता और वैराग्य से भर देता है। पर क्या हमने कभी इसे गहराई से समझने की कोशिश की है? क्या मृत्यु केवल एक अंत है या एक दैवीय ब्रह्मांडीय व्यवस्था का एक आवश्यक हिस्सा है?
सृष्टि के आरंभ से ही मृत्यु कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए एक पवित्र व्यवस्था थी। कहा जाता है कि जब ब्रह्मांड की पहली बार रचना हुई, तो चारों ओर जीवन ही जीवन था। सभी प्राणी अमर थे; न बुढ़ापा था न क्षय। धीरे-धीरे पृथ्वी पर असहनीय बोझ बढ़ने लगा और सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा। ब्रह्मा जी चिंतित हो गए – यदि जीवन शाश्वत रहा तो सृष्टि का चक्र कैसे चलेगा? विलय के बिना सृजन ही ठहर जाएगा। इसी चिंता से मृत्यु के जन्म का विचार उत्पन्न हुआ।धरती माता की चिंता
जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो वे चारों ओर व्याप्त सामंजस्य और समृद्धि को देखकर प्रसन्न थे। सभी प्राणी दैवीय नियमों के अनुसार जीते थे। न ईर्ष्या थी न द्वेष। सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, पशु और मानव, प्रेम और संतुलन में एक साथ रहते थे। अक्षयवट के वृक्ष की तरह जीवन अनंत रूप से बढ़ता रहा, जिसका न कोई आदि दिखता था न अंत। जैसे-जैसे समय बीता, पृथ्वी पर बोझ बढ़ता गया। सृजन चलता रहा, पर कोई मरता नहीं था। बोझ सहन न कर पाने के कारण धरती माता व्याकुल होकर रो पड़ी। वह हाथ जोड़कर ब्रह्मा जी के पास गई और बोली:”हे प्रभु! जर्जर शरीर होने पर भी प्राणी जीते ही जा रहे हैं। मेरे ऊपर भार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। कृपया ऐसा नियम बनाइए कि जो जन्म ले उसे एक दिन अपना नश्वर शरीर छोड़ना ही पड़े, क्योंकि अब यह भार मुझसे सहा नहीं जाता।” उसका दुःख देखकर ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु, भगवान शिव, इंद्र और अन्य देवताओं के साथ एक दिव्य सभा बुलाई। उसके कष्ट को समझकर उन्होंने संतुलन करने का संकल्प लिया।
मृत्यु देवी का सृजन
तब ब्रह्मा जी ने एक सुंदर नारी की सृष्टि की और उसका नाम रखा मृत्यु देवी। काव्य पंक्तियाँ:
अनंत जीवन जर्जर तन में,
भटक रहे बिन अंत के;
जो आया है सो जाएगा,
यही नियम है अनंत के।
ब्रह्मा ने तब रूप रचा,
एक तेजस्विनी आई;
“मृत्यु” नाम दिया उसको,
पर मन में भय समाई।
ब्रह्मा जी ने उसे आज्ञा दी:
“तुम घर-घर जाओगी और प्राणियों के कर्मों के अनुसार उनकी आत्मा को उनके नश्वर शरीर से मुक्त करोगी। “यह सुनकर मृत्यु देवी बहुत व्याकुल हो गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और वह बोली: “मैं मानवता के क्रंदन को कैसे देख पाऊँगी? जब मैं किसी की माता, किसी के पिता, पति, पुत्र, भाई या बहन को छीन लूँगी?
“काव्यमय पंक्तियाँ:
कैसे सहूँगी आर्तनाद मैं,
कोई खोएगा नयन का तारा,
कोई खोएगा अपना प्यारा
हृदय के चीत्कारों से
भर जाएगा जग सारा?
किसी का सहारा छूट जाए।उसका दुःख देखकर ब्रह्मा जी द्रवित हुए, पर वे कठोर रहे, क्योंकि पृथ्वी पर बोझ बहुत अधिक था। उन्होंने कोमलता से समझाया कि मृत्यु दंड नहीं, विश्राम है; जीवन की शत्रु नहीं, बल्कि पूरक है। जैसे दिन के बाद रात आती है, वैसे ही जन्म के बाद मृत्यु आती है, ताकि नए सृजन का मार्ग बन सके। उन्होंने उसे आत्माओं को शरीर से मुक्त करके उनकी आगे की यात्रा के लिए तैयार करने का पवित्र कर्तव्य सौंपा। भगवान यम को इस दिव्य नियम का संरक्षक नियुक्त किया गया – जो न्याय और संतुलन के प्रतीक हैं। इस प्रकार, मृत्यु का जन्म क्रूरता से नहीं, बल्कि करुणा और ब्रह्मांडीय आवश्यकता से हुआ। मृत्यु के आँसूमृत्यु देवी रोती ही रही और उसके आँसू पृथ्वी पर गिरे। ब्रह्मा जी ने कहा:”पुत्री, तुम अपना कर्तव्य करते हुए अदृश्य रहोगी। तुमने जो आँसू बहाए हैं, वे मृत्यु के विभिन्न कारणों के रूप में प्रकट होंगे। “ये कारण अलग-अलग रूपों में सामने आएँगे – बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदाएँ और अनगिनत अन्य परिस्थितियाँ। जब भी कोई मरता है, लोग उसे एक कारण से जोड़ देते हैं, पर वास्तव में यह मृत्यु ही है, जो अपनी दिव्य भूमिका निभा रही होती है। काव्य पंक्तियाँ:
आज धरा पर मृत्यु चले,
अनगिनत रूप धर ;
युग-युग से जीवन घूमे,
विधि के विधान पर ।
जो शरणागत हरि के हो जाए,
जन्म-मरण बंधन टूटे;
मुक्त हो आवागमन से,
नश्वर बंधन छूटे।
उदाहरण के लिए, यदि किसी परिवार की दुखद दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, तो लोग कहते हैं कि वे दुर्घटना के कारण मरे – पर वास्तव में वह मृत्यु ही थी जो उस परिस्थिति के माध्यम से आई थी। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो मृत्यु का जन्म उसी क्षण हो जाता है जिस क्षण जीवन का जन्म होता है। जन्म और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जन्म आशा देता है; मृत्यु अर्थ देती है। मृत्यु के बिना जीवन अपना मूल्य खो देगा और समय अपना महत्व खो देगा। मृत्यु हमें सिखाती है कि हर क्षण अनमोल है और हर रिश्ता पवित्र है।
काव्य पंक्तियाँ:
मृत्यु अटल सत्य है, सखी,
इससे कोई न बच पाए;
आने से पहले जीवन को,
सार्थक कर ले जाए।
सद्गुण और सत्संग से,
जीव मुक्ति पा जाता;
इस नश्वर संसार में,
मोक्ष का मार्ग पा जाता।
ध्रुव का उदाहरण
एक प्रेरणादायक उदाहरण ध्रुव का है, जिसने पाँच वर्ष की कोमल आयु में घोर तपस्या करके भगवान विष्णु के दर्शन प्राप्त किए। हजारों वर्षों तक राज्य करने के बाद, उसे दिव्य लोक में ले जाने के लिए एक दिव्य विमान आया। मृत्यु दूर खड़ी रही, ऐसे भक्त आत्मा को छूने में असमर्थ। उसने विनम्रता से प्रार्थना की कि वह स्वर्ग जाते समय उसके सिर पर पैर रखकर जाए। तब ध्रुव ने ध्रुवलोक प्राप्त किया और उत्तर आकाश में ध्रुव तारे के रूप में शाश्वत रूप से चमकता है।
इस प्रकार, मृत्यु के जन्म की कथा भयावह नहीं, बल्कि गहन और ज्ञानवर्धक है। मृत्यु जीवन की शत्रु नहीं; यह उसकी साथी है। यह अंत नहीं बल्कि एक परिवर्तन है – दो यात्राओं के बीच का एक विराम। जो इस सत्य को समझ लेता है, वह मृत्यु से नहीं डरता। इसके बजाय, वह जागरूकता, उद्देश्य और प्रेम के साथ जीता है। यह असाधारण और ज्ञानवर्धक कथा निश्चित रूप से गहन ज्ञान और अंतर्दृष्टि प्रदान करेगी है।
दूरदर्शी लेखिका / कवयित्री
सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’