इच्छा और ईश्वर का संघर्ष
इच्छा और ईश्वर का संघर्ष
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आवश्यकताओं को तो पूरा किया जा सकता है, पर इच्छाओं को नहीं। मनुष्य का संपूर्ण जीवन इच्छाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। बचपन में खिलौनों की इच्छा, युवावस्था में सफलता और प्रेम की इच्छा, फिर धन, सम्मान, परिवार
और सुख-सुविधाओं की इच्छा। एक इच्छा पूरी होती नहीं कि दूसरी जन्म ले लेती है। मेरे भाव-प्रवाह में —
नए रूप धर आ जाती है,
फिरTop of FormBottom of Form-फिर मेरे मन से,
तृष्णा तू न गई मेरे मन से।
तृष्णा तू न गई मेरे मन से।
आह बनाकर ब्रह्मा जी ने,
एक स्त्री प्रकटाई,
वरण किया न उसे किसी ने,
वह स्त्री सकुचाई।
ब्रह्मा जी ने फिर चाह बनाकर,
जब स्त्री प्रकटाई,
वरण किया फिर सभी ने,
ब्रह्मा जी मुस्काए।
सच तो ‘सखी’ यह था इसमें,
आह ही चाह बनी थी।
चाह नहीं जब होती पूरी,
आह ही मुख से निकले।
तृष्णा तू निकल जा मेरे मन से।
मनुष्य सोचता है —
जो मैं चाहता हूँ, वही हो जाए तो जीवन सुंदर बन जाए। परंतु जीवन हर बार उसकी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता। यहीं से भीतर संघर्ष प्रारंभ होता है — मनुष्य की इच्छा और ईश्वर की इच्छा का संघर्ष।
इच्छाओं का गुलाम हुआ मानव न जाने कैसे-कैसे कृत्य करके दुःख भोगने के लिए मजबूर हो जाता है। मनुष्य योजनाएँ बनाता है, पर ईश्वर परिणाम बदल देते हैं। कई बार जिस मार्ग पर चलने के लिए मनुष्य पूरी शक्ति लगा देता है, वही मार्ग अचानक बंद हो जाता है। और जिस दिशा की उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती, जीवन उसी ओर मुड़ जाता है। तब वह दुखी होकर कह उठता है
हे भगवान! मेरी सुनते क्यों नहीं?
बचपन से ही मानव मन कुछ न कुछ चाहता है, पर होता कुछ और है। यहीं से भीतर प्रश्न उठने लगता है —
जब सब कुछ भगवान के हाथ में है,
तो फिर हमारी इच्छाओं का क्या अर्थ?
कई बार मनुष्य पूरी श्रद्धा से प्रार्थना करता है, पर उसकी मनोकामना पूर्ण नहीं होती। तब उसे लगता है कि भगवान उसकी सुन नहीं रहे। जबकि संभव है कि ईश्वर वह देख रहे हों, जो मनुष्य अपनी सीमित दृष्टि से नहीं देख पा रहा। परंतु क्या सचमुच ईश्वर नहीं सुनते?
या वे वही सुनते हैं, जो मनुष्य के लिए उचित है?
एक छोटा बच्चा यदि अग्नि को सुंदर समझकर उसे छूना चाहे, तो माँ उसे रोक लेती है। उस समय बच्चे को माँ कठोर लग सकती है, पर वास्तव में वही रोक उसकी रक्षा होती है।
“जो मैं चाहता हूँ, वही हो जाए तो जीवन सुंदर बन जाए।” परंतु जीवन हर बार उसकी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता। यहीं से भीतर संघर्ष प्रारंभ होता है — मनुष्य की इच्छा और ईश्वर की इच्छा का संघर्ष।
ठीक वैसे ही कई बार ईश्वर मनुष्य की हर इच्छा पूर्ण नहीं करते, क्योंकि वे उसके भविष्य और उसकी आत्मा की दिशा — दोनों को देख रहे होते हैं। महाभारत में दुर्योधन की इच्छा राज्य थी, अर्जुन की इच्छा धर्म। कर्ण की इच्छा सम्मान थी, पर जीवनभर उन्हें उपेक्षा मिली। रावण की इच्छा अधिकार थी, श्रीराम की इच्छा मर्यादा। अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि सब कुछ बिना संघर्ष के शांत हो जाए। पर श्रीकृष्ण जानते थे कि यह केवल अर्जुन का व्यक्तिगत युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का निर्णायक क्षण है। यदि उस समय अर्जुन की इच्छा पूरी हो जाती, तो धर्म हार जाता।
मनुष्य सुख चाहता है, ईश्वर जागरण चाहते हैं। मनुष्य सुविधा चाहता है, ईश्वर आत्मबल जगाना चाहते हैं। मनुष्य परिणाम चाहता है, ईश्वर कर्म का भाव देखना चाहते हैं। पर मनुष्य का मन इतनी सहजता से कहाँ मानता है? वह बार-बार
अपनी इच्छाओं के अनुसार संसार को चलाना चाहता है। और जब ऐसा नहीं होता, तब भीतर शिकायत उठती है और यदि साधक मन हो, तो वह शीघ्र ही संयत हो जाता है। देखिए, ‘सखी’ के भक्त-हृदय का यह समर्पण भाव कितना सुंदर है —
कभी शिकवा-शिकायत है,
कभी मनुहार इबादत है।
प्रभु! तुम्हीं से है,
तुम्हीं से है, तुम्हीं से है।
ये रोशनी सारे जहाँ में,
तुम्हीं से है, तुम्हीं ही हो।
संतों का कहना है कि अपनी इच्छाओं को इतना तरसा दो कि वे इच्छा बनना ही बंद हो जाएँ। यह बहुत कठिन कार्य है, पर असंभव नहीं। जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, तब तक हर असफलता उसे तोड़ती रहती
है। पर धीरे-धीरे अनुभव उसे सिखाते हैं कि वह सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकता। कोई अदृश्य शक्ति है, जो संपूर्ण जीवन को संचालित कर रही है। यही कारण है कि संतजन समर्पण को इतना महत्व देते हैं। समर्पण का अर्थ हार मान लेना नहीं, बल्कि यह समझना है कि —
मेरी सीमित इच्छा से बड़ी भी कोई दिव्य व्यवस्था है। मीरा ने कृष्ण को चाहा, संसार ने उन्हें विष दिया। ध्रुव ने सम्मान चाहा, अपमान मिला; पर वही अपमान उन्हें तपस्या की ओर ले गया। प्रह्लाद ने केवल नारायण को चाहा, पर उन्हें यातनाएँ मिलीं। फिर भी अंततः वही पीड़ा उनकी आत्मा को ऊँचाई देती चली गई। वास्तव में ईश्वर हर इच्छा पूरी करने नहीं आते; वे कई बार इच्छा से ऊपर उठाने आते हैं। देखिए, ‘सखी’ की अनुभूति में यह भाव कितना गहरा उतरता है —
परखता बहुत दर बुलाने से पहले,
वो ठोकरें लगवाएँ स्वजन बन बतायें।
न जाने प्रभु कैसी लीला दिखायें।
कसौटी चढ़कर सोने का निखरना,
तपाना, घिसना, फिर कुंदन-सा बनना।
तपाया बहुत कुंदन बनाने से पहले,
परखता बहुत दर बुलाने से पहले।
यही तो जीवन का रहस्य है। मनुष्य सोचता है कि वह स्वयं सब कर रहा है, जबकि भीतर कोई और ही शक्ति उसे चला रही होती है। कभी अनुकूल परिस्थितियों से, कभी प्रतिकूलताओं से, कभी मिलन से, कभी वियोग से — ईश्वर अपनी लीला का विस्तार करते रहते हैं। धीरे-धीरे जीवन सिखाने लगता है कि इच्छा जितनी बढ़ती है, अशांति भी उतनी बढ़ती है। मनुष्य एक इच्छा पूरी होने पर कुछ क्षण प्रसन्न होता है, फिर दूसरी अभिलाषा जन्म ले लेती है। यह अंतहीन दौड़ उसे थका देती है। तभी भीतर से एक शांत स्वर उठता है —
हे प्रभु! अब वही देना जो मेरे लिए उचित हो।”
यहीं से समर्पण प्रारंभ होता है। इसका अर्थ इच्छाओं का समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से ऊपर ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना है।
मीरा ने महलों की इच्छा नहीं की, केवल कृष्ण को चाहा। श्रीराम ने राजसिंहासन से अधिक पिता की आज्ञा को महत्व दिया। कुंती ने सुख नहीं, भगवान का साथ माँगा। जब मनुष्य अपनी इच्छा को ही अंतिम सत्य मान लेता है, तब टूट जाता है। और जब वह ईश्वर की इच्छा में विश्वास करना सीख जाता है, तब धीरे-धीरे शांत होने लगता है। तभी भीतर यह भाव जन्म लेता है —
जो दिया वही प्रसाद, जो लिया वही स्वीकार।
तेरी इच्छा में प्रभु, छिपा है मेरा कल्याण।
शायद जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष यही है| मनुष्य अपनी इच्छा छोड़ नहीं पाता और ईश्वर अपनी लीला रोकते नहीं। पर जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि ईश्वर की इच्छा उसके अहित के लिए नहीं, बल्कि उसके जागरण के लिए है, उसी दिन शिकायत कम होने लगती है और विश्वास जन्म लेने लगता है और यहाँ एक और गहरा रहस्य है —
ईश्वर हमारी इच्छा पूरी न करके भी पूरी कर देते हैं, बस तरीका बदल देते हैं।
तुमने धन माँगा, उसने संतोष दे दिया। तुमने सम्मान माँगा, उसने विनम्रता दे दी। तुमने सुख माँगा, उसने शांति दे दी। तुम मछली माँग रहे थे, उसने समुद्र दे दिया पर तुम्हारी बाल्टी छोटी थी, इसलिए तुम समझ न पाए।
रावण ने अमरत्व माँगा, ईश्वर ने उसे राम के हाथों मोक्ष दे दिया। इच्छा का रूप बदला, पर कल्याण नहीं रुका। धीरे-धीरे साधक समझने लगता है कि इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं; वे केवल रूप बदलती रहती हैं। पर जब मनुष्य का मन ईश्वर में लगने लगता है, तब इच्छाओं का बोझ हल्का होने लगता है। तभी भीतर यह भाव जन्म लेता है —
तेरी कृपा से पाया तन,
तुम ही में लगा लूँ मन।
हर साँस ही अब हो तेरी,
साँसों का हर हिसाब
तेरे सामने है मेरा अंतरमन।
और जब यह भाव गहराने लगता है, तब मनुष्य अपनी हर अधूरी इच्छा को भी प्रभु की इच्छा मानकर स्वीकार करना सीख जाता है। तभी अंतरमन शांत होकर कह उठता है — ये मेरी अर्ज़ी है,
मैं वैसी बन जाऊँ,
जो तेरी मर्ज़ी है।
हे प्रभु! जो मैं चाहता हूँ वह मुझे मिले या न मिले, पर जो तुम चाहते हो उसे स्वीकार करने की शक्ति अवश्य देना। यहीं इच्छा और ईश्वर के संघर्ष का समाधान हो जाता है। क्योंकि अंत में जीत न इच्छा की होती है, न ईश्वर, की जीत होती है समर्पण की।
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– सुमित्रा गुप्ता साखी
Comments
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Bht sunder likha apne sumitra ji, Apka lekh Such me Vandaniye h