नारी और पुरुष (सृष्टि से पहले की स्थिति)
(यह कथा मेरी प्रकाशनाधीन पुस्तक “नारी + पुरुष – पूरक होते हुए भी लड़ते क्यों हैं?” का एक अंश है।)
सृष्टि से पहले की स्थिति
नारी और पुरुष की सबसे पहली उत्पत्ति कथा
ब्रह्मा के बाएं भाग से नारी, दाएं भाग से पुरुष
बहुत पहले जब कुछ भी नहीं था। न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूरज, न चांद। चारों तरफ सिर्फ गहरा अंधकार और जल ही जल था। उस समय सिर्फ एक परमात्मा था जिसे परब्रह्म कहते हैं। वो निर्गुण, निराकार और अकेला था।
तब परमात्मा जो निराकार परमब्रह्म है, उसके मन में एक इच्छा जागी – “एकोऽहम् बहुस्याम्” अर्थात “मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ। “उसी एक इच्छा से सृष्टि की शुरुआत हुई। अपनी ही लीला से उस परमब्रह्म ने अपने ही तीन रूप धारण किये, ताकि सृष्टि का काम चल सके – रचना के लिए ब्रह्मा, पालन के लिए विष्णु और संहार के लिए शिव। इन्हीं को हम त्रिदेव कहते हैं।
1. ब्रह्मा जी को – सृष्टि रचने का काम (उत्पत्ति) 2. विष्णु जी को – सृष्टि पालने का काम (पालन) जैसे माता-पिता अपने बच्चे का पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही विष्णु जी पूरी सृष्टि का पालन करते हैं। जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब वो अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। 3. शिव जी को – सृष्टि के संहार का काम (लय) संहार का मतलब खत्म करना नहीं, बल्कि पुरानी और खराब चीजों को हटाकर नई के लिए जगह बनाना। जैसे किसान पुरानी फसल काटता है ताकि नई उग सके। शिव जी अहंकार और बुराई का संहार करते हैं। इस तरह ब्रह्मा रचते हैं, विष्णु पालते हैं और शिव संहार करके फिर से नई सृष्टि के लिए मार्ग बनाते हैं। तीनों का काम एक-दूसरे के बिना अधूरा है।
ब्रह्मा जी ने 4 कुमार, 7 ऋषि और दक्ष को अपने मन से पैदा किया था। उनको “मानस पुत्र” बोलते हैं। 4 कुमार तो बचपन से ही वैरागी थे, वो तपस्या को चले गए। शुरू में सब मन से पैदा हुए थे, शादी से नहीं। । इसलिए सृष्टि तेजी से नहीं बढ़ रही थी। ब्रह्मा जी चिंतित हो गए। सृष्टि कैसे आगे बढ़ेगी? ब्रह्मा जी को समझ आ गया कि ऐसे मन से सृष्टि नहीं बढ़ेगी। तब उन्होंने घोर तप किया। तप के तेज से उनके शरीर में कंपन हुआ। तप के कारण ब्रह्मा जी का शरीर दो भागों में बंट गया। बाएं भाग से एक अत्यंत सुंदर नारी प्रकट हुई। उसके शरीर से करुणा, प्रेम और ममता झलक रही थी। दाएं भाग से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसके शरीर से शक्ति और ज्ञान की आभा निकल रही थी। शास्त्रों में लिखा है कि यही नारी और पुरुष सृष्टि के पहले जोड़े थे। नारी का नाम “शतरूपा” रखा गया क्योंकि उनके रूप सौ-सौ रूपों के बराबर था। पुरुष का नाम “स्वयंभू मनु” रखा गया क्योंकि वो खुद से प्रकट हुए थे। यही मैथुनी सृष्टि कहलाती है। यानी स्त्री-पुरुष के मिलन से आगे सृष्टि बढ़ेगी।
मानव रूप के भरण-पोषण के लिए ब्रह्मा जी ने सबसे पहले पूरी सृष्टि में अन्न, जल, औषधि और अन्य संसाधनों को अपने मन से उत्पन्न किया। जब रहने और भरण-पोषण की पूरी व्यवस्था हो गई, तब उन्होंने अपने शरीर से प्रकट हुए स्वयंभू मनु और शतरूपा का विवाह और कार्य ब्रह्मा जी ने खुद करवाया था और उन्हें आदेश दिया – “तुम दोनों पृथ्वी पर जाकर सृष्टि को आगे बढ़ाओ”। मनु और शतरूपा का विवाह संस्कार कराया, ताकि मैथुनी सृष्टि आरंभ हो सके। इन दोनों की विवाह से ही पहली बार “मैथुनी सृष्टि” शुरू हुई, मतलब स्त्री-पुरुष के मिलन से बच्चे होना। इन्हीं आदि पुरुष स्वयंभू मनु और आदि नारी शतरूपा के संयोग से मानव सृष्टि का शनैः-शनैः विकास हुआ। मनु की संतान होने के कारण ही हम सभी मानव, मनुष्य या मानुष कहलाए। इन्हीं मनु और शतरूपा की बेटियों की शादी फिर उन ऋषियों और दक्ष प्रजापति से हुई, तब जाकर सारा मानव वंश आगे बढ़ा।
“भारतीय संस्कृति के अनुसार ब्रह्मांड का प्रथम विवाह शिव-पार्वती का है, जो पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक है। वहीं मानव सृष्टि का प्रथम विवाह मनु और शतरूपा का हुआ था, जिनसे मानव वंश आगे बढ़ा। इससे यह सिद्ध होता है कि आरंभ से ही नारी और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं।
मनु और शतरूपा ने तपस्या की। फिर उनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद, तथा तीन पुत्रियां, आकृति, देवहूति और प्रसूति हुईं। प्रियव्रत बहुत प्रतापी राजा बने। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव हुए जिन्होंने घोर तप करके भगवान को पाया। आकूति की शादी ऋषि रुचि से हुई, देवहूति की शादी ऋषि कर्दम से हुई जिनके घर भगवान कपिल का अवतार हुआ, और प्रसूति की शादी दक्ष प्रजापति से हुई।
आगे चलकर दक्ष प्रजापति की 60 बेटियां हुईं। उनकी शादी अलग-अलग ऋषियों और देवताओं से हुई। इसी तरह कर्दम ऋषि और देवहूति के 9 बेटियां और 1 बेटा हुआ। धीरे-धीरे मनु और शतरूपा के वंश से पूरी पृथ्वी भर गई। मनुष्य, देवता, गंधर्व, ऋषि सब इन्हीं से उत्पन्न हुए। इसीलिए मनु को “मानव जाति का पिता” और शतरूपा को “मानव जाति की माता” कहा जाता है।
इस कथा से हमें 3 बातें सीखने को मिलती हैं।
पहली – नारी और पुरुष दोनों बराबर हैं। ब्रह्मा जी के एक ही शरीर से दोनों निकले। न कोई छोटा न कोई बड़ा।
दूसरी – सृष्टि एक के बिना पूरी नहीं होती। अकेले पुरुष या अकेली नारी से सृष्टि नहीं चल सकती। दोनों का संतुलन जरूरी है।
तीसरी – परिवार और गृहस्थ जीवन का महत्व। वैराग्य से सृष्टि नहीं चलती। इसीलिए मैथुनी सृष्टि शुरू हुई।
इस तरह ब्रह्मा जी के बाएं भाग से नारी और दाएं भाग से पुरुष की उत्पत्ति हुई। मनु और शतरूपा से पूरी मानव सभ्यता चली। आज भी हम उसी परंपरा का हिस्सा हैं। इसीलिए हर पूजा में, हर यज्ञ में नारी और पुरुष दोनों का होना जरूरी माना गया है।
अतः नारी और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं। सृष्टि को सुंदर चलाने के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समन्वय और सामंजस्य की आवश्यकता है।
निवेदन: सृष्टि की कथाएँ अनेक पुराणों में अनेक रूपों में मिलती हैं। मैंने अपने हृदय के भावों को अपनी समझ और श्रद्धा के अनुसार इस कहानी में पिरोने का छोटा सा प्रयास किया है। यदि इसमें कोई त्रुटि रह गई हो तो मैं हृदय से क्षमा चाहती हूँ।