भगवान की लीला मनमानी क्यों लगती है?
भगवान की लीला मनमानी क्यों लगती है?
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मनुष्य तो मनुष्य, भगवान भी मनमानी करते प्रतीत होते हैं — यह भाव लगभग सभी के मन में कभी न कभी अवश्य आता है। मनुष्य जब तक जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार चलता हुआ देखता है, तब तक उसे लगता है कि संसार बहुत व्यवस्थित है। पर जैसे ही परिस्थितियाँ उसके मन के विपरीत होने लगती हैं, भीतर शिकायत जन्म लेने लगती है। कभी अचानक कोई अपना बिछड़ जाता है, कभी बिना कारण अपमान मिल जाता है, कभी अथक प्रयासों के बाद भी सफलता हाथ नहीं आती, तो कभी जीवन की सारी योजनाएँ एक क्षण में बदल जाती हैं। तब मन अनायास ही कह उठता है —
भगवान तो मनमानी करते हैं।
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सदियों से मानव हृदय का मौन प्रश्न है। कोई इसे आँसुओं में पूछता है, कोई प्रार्थना में कोई मौन में और कोई विद्रोह में। क्योंकि मनुष्य समझ नहीं पाता कि — यदि भगवान दयालु हैं, तो फिर जीवन में इतना दुःख क्यों है? जब अहिल्या पत्थर बनीं, तब भी यही प्रश्न उठा होगा। जब द्रौपदी भरी सभा में पुकार रही थीं, तब भी। जब सीता माता को वन जाना पड़ा, जब मीरा को विष मिला, जब प्रह्लाद को यातनाएँ दी गईं — तब भी यही लगा होगा कि भगवान यह सब पहले ही क्यों नहीं रोक देते? मनुष्य का हृदय आज भी यही पूछता है
प्रभु! तुम समर्थ हो, कुछ कर न सके?
असमर्थ हूँ मैं, क्या करूँ?
यदि चाहते तो रोक सकते थे,
फिर क्यों नहीं रोका?
यहीं से आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है। क्योंकि यह प्रश्न केवल शिकायत नहीं है; यह ईश्वर को समझने की तड़प भी है। वास्तव में मनुष्य जीवन को अपनी सीमित दृष्टि से देखता है, जबकि ईश्वर संपूर्णता से देखते हैं। मनुष्य केवल वर्तमान का दुःख देखता है, पर प्रभु उसके भीतर छिपा जागरण भी देख रहे होते हैं। कई बार जो घटना उस समय क्रूर लगती है, वही आगे चलकर जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन बन जाती है। हमारी दृष्टि सुई की नोंक जितनी है, उसकी दृष्टि संपूर्ण सृष्टि पर है।
वैसे ही ईश्वर जब हमारी कोई ज़िद, कोई योजना तोड़ता है, तब वह निर्दयी लगता है। पर वह हमें भविष्य की उस बड़ी आग से बचा रहा होता है, जिसे हम देख ही नहीं पाते। माँ से बढ़कर कोई वैद्य नहीं और भगवान से बढ़कर कोई माँ नहीं। इसलिए हर रोक में रक्षा छिपी है।
पर मनुष्य इसे तुरंत स्वीकार नहीं कर पाता। क्योंकि उसके भीतर “मैं” और “मेरा” का भाव बहुत गहरा होता है। वह चाहता है कि जीवन उसकी इच्छा से चले। और जब ऐसा नहीं होता, तब उसे ईश्वर की व्यवस्था मनमानी प्रतीत होती है। धीरे-धीरे अनुभव सिखाता है कि —यह संसार केवल सुख का स्थान नहीं है। यहाँ मिलन है तो बिछड़ना भी है। लाभ है तो हानि भी है। सम्मान है तो अपमान भी है। प्रकृति स्वयं ही द्वंद्वमयी है। इसी द्वंद्व के बीच आत्मा को जगाना होता है। मेरे शब्दों में..
द्वंद्वों का है यह जग सारा
द्वंद्वों में ही प्रभु अवतारा।
सुख-दुःख का यह द्वंद्व है कैसा,
मन मेरा फिर कुंद है कैसा।
इसीलिए संतजन नाम-जाप, सत्संग और धर्मग्रंथों के पठन-पाठन पर इतना बल देते हैं। क्योंकि यही साधन मनुष्य को जीवन की घटनाओं के पीछे छिपे संकेत समझने की दृष्टि देते हैं। देखिए, ‘सखी’ के शब्दों में प्रभु की लीला का यह भाव कितना अद्भुत है —
अजब प्रभु की लीला, गजब है निराला,
समझ से परे हैं प्रभु के सभी खेला।
रुलाता-हँसाता, हँसाता-रुलाता,
अँधेरे में दीपक जलाता-बुझाता।
वास्तव में प्रभु की लीला तर्क से नहीं, अनुभव से समझ आती है। कभी वे गिराकर सँभालते हैं, कभी छीनकर भीतर से समृद्ध कर देते हैं। कई बार मनुष्य जिस दुःख को घटना समझता है, वह उस समय क्रूर लगती है, वही आगे चलकर जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन बन जाती है। हमारी दृष्टि सुई की नोंक जितनी है, उसकी दृष्टि संपूर्ण सृष्टि पर है।
बच्चा धधकते चूल्हे की ओर लपकता है, तो माँ झपटकर उसे खींच लेती है। कभी थप्पड़ भी लगा देती है। बच्चा बिलखता है — “माँ बुरी है।” पर माँ जानती है कि —यह क्षणिक पीड़ा उसे जीवन भर की आग से बचा रही है। बच्चा नहीं समझ पाता कि माँ उसके भले के लिए कर रही है।
वैसे ही ईश्वर जब हमारी कोई ज़िद, कोई योजना तोड़ता है, तब वह निर्दयी लगता है। पर वह हमें भविष्य की उस बड़ी आग से बचा रहा होता है, जिसे हम देख ही नहीं पाते। माँ से बढ़कर कोई वैद्य नहीं और भगवान से बढ़कर कोई माँ नहीं। इसलिए हर रोक में रक्षा छिपी है।
यही हाल मानव मन का है| तभी भीतर समर्पण का भाव जागता है और जब यह भाव भीतर उतरने लगता है, तब शिकायत धीरे-धीरे शांत होने लगती है। तब मनुष्य समझने लगता है कि — शायद भगवान मनमानी नहीं करते; वे अपनी अनंत लीला में आत्माओं को जगा रहे होते हैं। तभी अंतरमन मौन होकर कह उठता है —
हे प्रभु!
जो समझ में आए उसमें भी तुम,
और जो समझ में न आए उसमें भी केवल तुम।
तुम ही तुम हो, तुम ही तुम,
तुमसे अलग नहीं कुछ हम।
जब यह भाव जन्म लेने लगता है, तब शिकायत धीरे-धीरे समर्पण में बदलने लगती है। मनुष्य समझने लगता है कि जीवन केवल उसकी इच्छा से नहीं चल रहा, बल्कि किसी विराट चेतना की सूक्ष्म व्यवस्था से प्रवाहित हो रहा है और शायद तभी वह मुस्कुराकर कह उठता है हाँ… भगवान तो मनमानी करते हैं।
– सुमित्रा गुप्ता साखी