Vibha joshiPoem 173‘एक गृहनी का सपना,’ एक प्यारा सा आँगन हो मेरा , . *जहा बच्चे की किलकारी का हो डेरा,.* बुजुर्ग को के आशीर्वाद से हो सुबह मैरी, *पति के संग स चाय से हो मैरी साम पूरी,… *इन सब के साथ मुझे पँख खोलने का दो एक मौका, *मेरी कॅरियर की उड़ान को ना जाए रोका,* कूछ खास बनके दिख ला ने का हैँ मेरा भी सपना, *ये वादा हैँ मेरा अपना.. 🙏🏻यही हैँ एक गृहनी का सपना‘एक गृहनी का सपना,’ एक प्यारा सा आँगनRead More...
Mohammed Zahoor KhanPoem 41125 hazar ki naukri magar sukoon zara bhi nahin25 hazar ki naukri magar sukoon zaraRead More...
Mohammed Zahoor KhanPoem 443Bhediya jungalo mein hi nahin sahar mein bhi rehate hainTheek suna hai aap ne, Bhediya jungaloRead More...
मदन मोहन'मैत्रेय'Poem 346बनाते हुए चलूं, राह में सपनों को’बनाते हुए चलूं, राह में सपनों को’Read More...